फरीद खान

सुबह पूरा देश स्वतंत्रता की 80 वी वर्षगांठ मना रहा था…कोई बच्चा स्कूल जाने की जल्दी में था तो कोई नेता जिन्हें ध्वजारोहण करना था, व्यस्त थे…हम लोग खबर नवीस हैं… खबरों से रात दिन का नाता है…आज का दिन अखबारी दुनिया से आने वाले पत्रकारों के लिए थोड़ा सुकून भरा होता है। क्योंकि समाचार पत्र कार्यालय की छुट्टी रहती है, इसीलिए थोड़ा खुद को जीने की कोशिश करते हैं… लेकिन पत्रकार की ज़िंदगी बड़ी ही आपाधापी वाली होती है…घर देखना, खबरें देखना, खबर मिसिंग क्यों हुई यह सोचना…दोस्ती, रिश्तेदारी वगैरह वगैरह… देखना…इन सब के बीच आज जब देवास के पत्रकारों में यह खबर फैली कि प्रेस क्लब अध्यक्ष ललित शर्मा जी नहीं रहे तो हर कोई स्तब्ध रह गया…किसी ने कल के किस्से कोई परसों की ललित जी की बात कर रहा था तो कोई आज सुबह का ही जिक्र कर ललित जी को याद कर रहा था कि जिन्होंने सुबह तीन जगह ध्वजारोहण में हिस्सा लिया… अचानक हम सब के बीच से ऐसे कैसे रुखसत हो गए… लेकिन यह बात भी सही है कि एक दिन अभी को जाना है… लेकिन ललित जी हमेशा खामोश रहकर सबकी बात सुनते थे, किसी बात पर मतभिन्नता होने के बावजूद भी ललित जी तल्लीन नजर आते थे। लेकिन अगर ललित जी अंदर ही अंदर चुप ना रहकर बात करते तो कुछ अंदर का बोझ कम हो जाता…ललित जी को लेकर सभी चुप हैं… ललित जी को हार्टअटैक से हम सब के बीच से जाना पड़ा आज देवास में ही तीन लोगों की मृत्यु इसी वजह से हुई… सुबह ललित जी घर पर सभी का रो रोकर बुरा हाल था… और हो भी क्यों ना…जब बीवी और बच्चों की छत ओझल होती है, तब शब्द कम पड़ जाते हैं… दोस्तों के साथ बैठने वाला दोस्त कम हो जाता है तो कुर्सी खाली हो जाती है, जिसे कोई उस तरह से नहीं भर सकता…जैसे आप उस कुर्सी पर बैठे अपने यार को महसूस करते थे… ललित जी का एकाएक जाना हमें एक मैसेज जरुर दे रहा है, वक्त का कोई भरोसा नहीं…इसलिए भले ही किन्हीं चीजों में मत अलग हो सकते हैं, बस मन मिलाने की कोशिश करते रहिए…


